ज्ञान और जीव-शरीर

सामान्यत "ज्ञान", जिस कि हम बात करते हैं वह ज्ञान, भौतिक-शरीर को या ज्ञान-जीव शरीर (जीव शरीर अपने प्रारब्ध कर्म अनुसार, सुख और दुख महसूस करता है) को ये अंतर करना या समझना, मुश्किल तो है, परंतु समझना भी जरूरी है।
जीव-शरीर को समझ देर से आती है क्योंकि वह माया-मय होता है। जीव-शरीर ही भौतिक-शरीर (पंच ज्ञानेंद्रियों से निर्देशित होता है) को अपनी इच्छाओं के अनुसार चलाता है। शरीर को हानि आदि भी बिना सोच विचार के होती है। चाहे वो अपराध हो या आत्म घात।
जीव-शरीर इन्द्रियों के सुख की ओर आकर्षित होता है और तुरंत आराम चाहता है। वह माया से परतन्त्र होता है। जब माया से हट कर ज्ञान प्राप्त कर पाता है तो उसे ज्ञान कह सकते हैं जो आप शास्त्रों में पढ़ते हैं। यह ज्ञान अभ्यास से संभव है।
बड़े बड़े प्रवचन करने वाले भी माया अधीन होते हैं। वो बड़े बड़े आश्रम व मठ बनाते हैं जहाँ पर माया का भंडार होता है। राजा और राज्य को प्रभावित कर माया में लिप्त रहते।
जो योगी माया को नियंत्रण में रख कर जीव शरीर द्वारा कर्म काटते हैं वो सच्चे योगी है उन्हें किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं है।
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